कौन कहता है कि सरजू महान था
स्वर्ग के उत्तर
पूर्वी छोर पर स्थित पुरर्वा महाविद्यालय में मेघ की कश्ती पर बैठे विशाखा और वरुण
आश्चर्य चकित थे कि रवि की कलाओं में नियमित रूप से नवीनता कैसे आती है ? वरुण
सहसा ही जैसे विशाखा के मन के भाव पढ़ कर बोल पड़ा
“ उस दिन जब
महाविद्यालय के वार्षिक सम्मलेन में “देवपुत्र” हाउस की और से मैं भगवान सूर्य को
निमंत्रण देने गया था तो मैं चाह कर भी अपने को रोक न पाया था और मैंने उनसे पूछ
ही लिया था कि अस्त होते समय जो वर्ण संयोजन आपके द्वारा दिखाया जाता है, उसमें
मात्र सात वर्णों के प्रयोग से ही इतनी विविधता कैसे संभव हो पाती है ? तब
उन्होंने हल्की से मुस्कान के अलावा मेरी बातों का कोइ उत्तर न दिया था | “
यह विषय रुचिकर
तो था पर दोनों को अगले ही दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के किसी अध्याय पर
शोधपत्र प्रस्तुत करना था तो विशाखा को मजबूरन वरुण को टोकना पड़ा और उन्होंने आकाश
से निवेदन किया कि वह उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के सम्बन्ध में कुछ एतहासिक
घटनाएं दिखाए | अमूमन आकाश का तर्क होता था कि उसे समय तथा स्थिति स्पष्ट बताई
जावे तभी वह उस समय कि घटनाएं स्क्रीन पर दिखाएगा पर इस बार मामला कुछ और था |
आकाश ने पृथ्वी के ४.५ अरब वर्ष में सभी घटनाएं देखीं थीं वह ज्ञानी तो था ही पर
मानवों की तरह उसकी भी पसंद–नापसंद थी | भारत का स्वाधीनता संग्राम उसके प्रिय
विषयों में था और सभी इतिहासकारों की तरह
कारणों और परिणामों की व्याख्या के उसके अपने कुछ अलग ही सिद्धांत थे |
आकाश ने
विद्यार्थियों को बताया कि वह १९४२ से प्रारंभ कर रहा है ,विशाखा ने सहमति में सर
हिला दिया क्योंकि उन्हें पता था कि यदि वे आकाश का विरोध भी करते तो भी आकाश अपने
तर्कों से उन्हें शांत कर ही देता |
स्क्रीन पर यह
इबारत उभरने लगी
८ अगस्त १९४२ बंबई ,ग्वालिया टैंक मैदान
एक कृशकाय से
वृद्ध की तस्वीर उभरी जो जनता से कह रहा था “आज मैं आपको एक छोटा सा मन्त्र देता
हूँ –करो या मरो “ गांधी जी ने भारत छोडो आंदोलन का आह्वान कर दिया था | सभी को लग
रहा था कि आजादी कि लड़ाई उस निर्णायक दौर में पहुँच गयी थी कि अब पीछे लौटने की
स्थिति संभव नहीं थी | अगले दिन के अखबारों में यह खबर थी कि गांधी जी करो या मरो
का आवाहन कर चुके हैं और अधिकाँश बड़े नेताओं को या तो गिरफ्तार किया जा चुका है या
भूमिगत हो चुके हैं | धीरे धीरे सारा देश जान गया कि अब संघर्ष वास्तव में जनता के
हाथों में है और जनता को स्वयं निर्णय लेकर भारत को आजाद करना है |
२३ सितम्बर १९४२ तामलुक,मिदनापुर ,बंगाल
इसके ठीक बाद
स्क्रीन पर एक दुबले से आदमी का चेहरा उभरा जिसका नाम सरजू था ,विशाखा ने
प्रश्नवाचक नजरों से आकाश को देखा पर उसने उसे इंतज़ार करने का इशारा किया | विशाखा
समझी कि अब आकाश विषय सन्दर्भ से हट कर कुछ बताने वाले हैं पर वो सम्मानित थे और
सबसे बड़ी बात इतना सारा ज्ञान रखने के नाते अपरिहार्य थे सो उनसे विवाद का कोइ
औचित्य नहीं था |
आकाश की गंभीर
आवाज कथा सुनाने लगी | सरजू मिदनापुर के पास तामलुक गाँव में किसान है,लगभग दो एकड़
जमीन उसके पास है पर अक्सर उसको जीवनयापन के लिए खेतों में मजदूरी करनी ही पडती है
|19४२ में गांधी जी ने सारे देश में आंदोलन की घोषणा की थी पर
लोगों में द्वितीय विश्व युद्ध की कठिनाइयों के बाद इतना गुस्सा दबा हुआ था कि
जल्दी ही हालात सरकार के लिए बेकाबू होने लगे थे | सरजू के बारे में एक बात थी जो
उसे बाकी किसानों से अलग करती थी ,भारत में साक्षरता का प्रतिशत १० से भी कम था और
ये १० % भी अपेक्षाकृत संपन्न लोग थे | सरजू के सामाजिक वर्ग में साक्षरता का
प्रतिशत .१ % भी रहा हो तो आश्चर्यजनक है
| दूसरी विशेष बात यह थी कि सरजू कांग्रेस के दफ्तर जाता था और वहाँ रखे अखबारों
को पढता था और कार्यकर्ताओं से अपनी शंकाओं का समाधान भी कर लेता था | रमा दीदी
दफ्तर में प्रायः दो बजे के बाद आती क्योंकि दो बजे उनके स्कूल की छुट्टी होती
वहीं सरजू भी आधे दिन के काम के बाद किसी सवारी को दफ्तर छोड़ वहीं बैठ जाया करता था | यूं तो सरजू गंवार था पर दीदी
बस नाम की ही दीदी थीं असल में उम्र उनकी दादी वाली थी पर कुछ लोगों के साथ उपनाम
कुछ यूं चिपक जाते हैं कि उम्र भी उनका कुछ नहीं बिगाड पाती | रमा दीदी को सरजू
अच्छा छात्र लगता और वो उसे अहिंसा सत्याग्रह अदि के बारे में धर्म से जोड़ कर
समझाती थी | सरजू को यूं तो आधी बात ही समझ आती पर वो दीदी के सामने खुद को निरा
मूर्ख साबित नहीं करना कहता था | इस प्रकार धीरे धीरे सरजू को लगने लगा कि गांधीजी
जो करने को कह रहे हैं वही असली धर्म है यानी कि अपने लिए काम करो तो कर्म और समाज
के लिए करो तो धर्म |
प्राय: कांग्रेस
के कार्यकर्ता सरजू को समझाते थे कि भारत में कोई
आंदोलन अब तक ऐसा नहीं रहा जिसमें देश के गरीबों के एक फीसदी ने भी भाग
लिया हो | १८५७ की क्रान्ति हो या बंगाल विभाजन का विरोध,आंदोलन सामाजिक और
क्षेत्रीय रूप से सीमित ही रहे | पर इस बार यदि सरजू के जैसे लोग एक माह के लिए भी
पूरी तरह आंदोलन में खुद को झोंक सके तो जल्दी ही देश आजाद होगा | सरजू को धीरे
धीरे ये लगने लगा था कि यदि जैसे कुछ कर गुजरने का मौक़ा अभी है या तो सारी जिदगी
वह रिक्शा चला चला कर कीड़े की तरह सिर्फ अपने लिए जीवन जीता रहेगा और एक दिन कीड़े
की तरह मर जाएगा | उसे खुद से और अपने आस पास के लोगों और हालत से घिन होती
,अंग्रेज जब उसके रिक्शे पर बैठते तो वे उसे वाकई कीड़ा समझते ,कितनी ही बार
अंग्रेज उसे जूतों से पीट चुके थे क्योंकि वो लोग काले कुलियों को हाथ लगाने में
घिन महसूस करते थे| उसके साथी लोग भी जूते खाते थे पर वो समझते थे कि पिछले जन्म
का कर्ज तो उतारना ही पडेगा| दूसरी बात यह है कि अंग्रेज कभी कभी मूड में होने पर
पैसे भी अच्छे देते थे जिससे लाख पिटने के बाद भी लोग उनके आगे पीछे पैसों की आस
में घूमते रहते थे |
सरजू ने भरसक
कोशिश की कि साथियों को समझाए ,उसने धर्म ,देशभक्ति ,नई सरकार के राज में आमदनी
वगैरा कई प्रलोभन दिए पर लोगों को ब्रिटिश राज में काम करने वाले सिपाहियों के
डंडों की ताकत और अपनी ताकत का अंदाजा था इसीलिए सरकार से जिंदगी भर का बैर लेकर
लोग देशभक्त कहलाना पसंद नहीं करते थे|
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भारत छोडो आंदोलन
में तामलुक गाँव भी शामिल हो चुका था | पहले दिन जुलूस में उसके तीन दोस्त शामिल
हुए पर जब अगली पंक्ति के लोगों पर पुलिस के डंडे पडने लगे तो ये लोग कब गायब हुए
सरजू पता ही नहीं कर सका | सरजू को स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि पुलिस डंडे
मारे तो उसका प्रतिरोध नहीं करना है और यदि गिर भी जाओ तो भागना नहीं है जो आदमी
प्रतिरोध न कर रहा हो उस पर बल प्रयोग करना किसी क़ानून के तहत वैध नहीं है | उसे
डंडे की मार पडी और वह गिर गया पर जब पुलिस वालों ने देखा कि डंडों से बात नहीं बन
रही तो उन्होंने सत्याग्रहियों को जेल में डालना शूरू कर दिया | ३ दिन बाद शहर की
जेलें भी भर चुकी थीं और उसके जैसे हाशिए पर पड़े लोगों से यह उम्मीद पुलिस को नहीं
थी कि वो जेल जाने के बाद भी दुबारा सत्याग्रह करेंगे | इसके अलावा सरकार का ध्यान
पढ़े लिखे कांग्रेसी वर्ग की और ज्यादा था |
तो सरजू जैसे
लोगों को छोड दिया गया ,वह जब तक घर पहुंचा तो शाम हो चुकी थी | उसकी चोटों पर
बीवी ने हल्दी लगाई तो उसे अहसास हुआ कि घर और घरवाली का जिन्दगी में कितना
महत्त्व है| दो दिन तक तो बच्चों को किसी तरह सरला ने खाना खिला दिया था लेकिन उस
दिन पैसे और सामान सभी खत्म हो चुके थे वो बोली “ ये सब जुलूस और बड़ी बड़ी बातें उन
लोगो को ही सोभा देती हैं जिनका पेट भरा है अगर तुम रोज काम नहीं करोगे तो हम क्या
खाएंगे | आज तो बंसी को बच्चों पर तरस आ गया पर रोज रोज कौन खिलाएगा ?” “मैं मर
गया था क्या जो बंसी के पास भीख माँगने गयी थी” “घर में राशन हो और मैं बाहर कदम
रखूँ तो मोरे पाँव काट देना पर अगर बच्चे भूखे रहे तो फिर तुम्हारा क्या करूं यह
भी बता दो ”
कुछ पुलिस के
डंडों कुछ बीवी की डांट और कुछ बच्चों के पेट से चिपकी पीठ का असर था कि सरजू अगले
दिन अपने घावों को भूल कर रिक्शा लेकर निकल पडा ,हर तरफ दौड भाग मची हुई थी ऐसे में सवारियां हर दाम देने को तैयार
थीं पर सरजू का मन काम में नहीं था | जिसने जो दिया उसने बिना गिने रख लिया | न
जाने क्यों वह चौक की और चल पड़ा जहां सत्याग्रहियों ने जैसे मर मिटने की कसम खा ली
थी सरजू को कभी कभी तो लगता कि वो लोग पागल हो गए हैं जो अंग्रेजों के सामने पिटने
बैठ जाते हैं | सरजू चौक के पास खडा था तभी दो बुजुर्ग आकर एक घायल नवयुवक को लाकर
रिक्शे में डाल गए और एक आना देकर कांग्रेस कार्यालय ले जाने को कहा | सरजू उसे
लेकर चल पड़ा लडके के सर से खून बह रहा था | सरजू से रहा न गया वह पूछ बैठा “कहाँ
के हो भैया ” “कानपूर के पास गाँव है बरखेड़ी ” “ ब्याह हो गया “ “हूँ ” “बाल बच्चे
” “एक लड़का है ” “कालेज पढते होगे ” “पढता था, अब नोकरी छोड़ दिए हैं ” “मैं भी दो
दिन आन्दोलन में भाग लिया फिर .....” | नवयुवक बोला “जितना सधे उतना करो ...तुम अपनी जगह सही हो
भाई... पर मै चाहे पत्नी के पास रहूँ चाहे बच्चे को लाड करूं ,लगता है मैं उनके
प्यार का हकदार नहीं,खेती से गुज़ारा तो नहीं होता पर क्या करें ? यहाँ मर जाऊं तो
घर कैसे चलेगा नहीं पता ,पर घर में रह कर भी लगता है कि कम से कम मैं ज़िंदा तो
नहीं हूँ “ “ अच्छे काज कर रहे हो फल जरूर
मिलेगा ” “सो तो पता नहीं पर घर से चिठ्ठी आयी है कि बच्चा बीमार है ,ऐसा न हो कि
मेरी सनक का फल उसे मिल जाए ” | सरजू के मुंह से अब कोई दिलासा के बोल न फूटे मन
में चुपके से कहीं ये विचार भी आया कि उसने अच्छा किया कम से कम बाल बच्चे तो ठीक
हैं पर वह इस विचार से अधिक प्रसन्नता प्राप्त न कर पाया | लडके को काँग्रेस के दफ्तर
छोड़ कर वह सांझ से पहले ही घर चला गया | उसने सोचा किसानों का क्या बोरा दो बोरा
अनाज तो घर में डला ही रहता या आपस में उधार ले लेते हैं पर हम लोगों को तो रोज
कुआं खोदना है और रोज पानी पीना है | बीवी भी रोज भगवान से मनाती थी कि कहीं
पतिदेव दुबारा न सनक जाएँ |
अगले दिन जब सरजू
चौक से गुजरा तो हमेशा की तरह सत्याग्रहियों को हटाया नहीं गया था बल्कि वो बीच
रोड में बैठे हुए थे | पुलिस रोज रोज के लाठी चार्ज से कुछ उकताई सी मालूम पडती थी
और चूँकि दोपहर का समय था सो हेड साहब भी सिपाहियों के साथ एक परचून की दूकान में
आराम फरमा रहे थे इतनी आवाजाही सड़क पर नहीं थी कि सत्याग्रहियों के बैठने से किसी
को समस्या होती | अचानक एक सिपाही हांफता हुआ आया और उसने बताया कि कलेक्टर साहब
की बग्गी उधर ही आ रही है | हेड साहब और सिपाही जो कि भारतीय ही थे डंडे लहराते
दौड पड़े | आज नेतृत्व रमा दीदी के हाथ था क्योंकि अधिकांश नेता या तो जेल या
अस्पताल में थे | पुलिस वालों के चिल्लाने पर और लाठीचार्ज की धमकी पर भी वो
निर्निमेष सी बैठी रही बोली “ अच्छा है कलेक्टर साहब स्वयं आ रहे हैं हमारे नेताओं
को छोड़ दिया जाए हम भी उठ जाएँगे ” “अरे अम्मा क्यों पाप लगाती हो एकाध डंडा भी
पड़ा तो सीधे परलोक सिधार जाओगी ” हेड साहब जो कि अंग्रेज कानून और हिन्दू कर्मकांड
में बराबर विश्वास रखते थे बोले | कलेक्टर साहब की गाड़ी पास आ चुकी थी हेड साहब
व्यवाहरिक हुए और समझ गए कि परलोक सुधारना तो बाद में भी हो सकता है वर्तमान
समस्या तो कलेक्टर साहब हैं | रमा दीदी को चिल्ला कर नारे लगाते देख कलेक्टर साहब
का पारा सांतवे आसमान पर था “ला एंड आर्डर बनाए रखो जरूरत पड़े तो गोली चलाओ हम
इनाम देगा नहीं तो इन्क्वैरी के लिए तैयार रहो ” | पुलिस इनाम के लिए जुलूस पर पिल
पडी ,उन्हें किसी कानून की जरूरत नहीं थी बल प्रयोग के लिए ,आखिर हिन्दुस्तान की
जनता पुलिस पर मुकदमा कर नहीं कर सकती थी और जानते भी नहीं थी कि पुलिस किन धाराओं
का उल्लन्घन कर रही थी | रमा दीदी के सर से खून बह रहा था ,सरजू पर कुछ तो
देशभक्ति का जूनून सवार हो रहा था दूसरे दीदी को इस तरह छोड जाना उसे गवारा न था |
उसने बेहोश दीदी को रिक्शे में डाला और कांग्रेस दफ्तर की और चल पड़ा |
उधर यह खबर जंगल
में आग की तरह फ़ैल चुकी थी कि मातंगिनी हजरा को कोर्ट के सामने गोली मार दी गई है
| वह एक बूढ़ी किसान औरत थी जो कि जुलूस को कोर्ट की और ले गयी थी वह पुलिस को
समझाना चाहती थी कि निर्दोष भीड़ पर गोली न चलाई जाए पर अंग्रेज अफसरों ने उसे भीड़
का नेता समझ कर निशाना बना लिया था | यह खबर तामलुक के रहवासियों के लिए बारूद में
चिंगारी की तरह थी ,गुस्साई भीड़ ने जल्दी ही पुलिस थाना ,कोर्ट ,कलेक्ट्रेट सभी को
अधिकार में ले लिया | सभी अंग्रेज अफसरों को जेल में बंद कर दिया गया | इस बार कई
हिन्दुस्तानी अफसर भी जनता के साथ थे | दो दिनों के अंदर ही शहर में ब्रिटिश शासन
समाप्त हो चुका था और मिदनापुर का नाम पहली स्वदेशी सरकार के रूप में इतिहास में
दर्ज हो चुका था |
कांग्रेस दफ्तर में उत्सुक सा सन्नाटा था सभी को
पता था कि जल्द ही किसी न किसी प्रकार से विद्रोह की सूचना कलकत्ता और दिल्ली
पहुंचा दी जाएगी फिर ब्रिटिश शासन अपने अपमान का बदला जरूर लेगा | दफ्तर के बीच
बैठे डी.एस.पी घोष योजना समझा रहे थे “ मुद्दे की बात तो यही है कि किसी न किसी
तरह कोई अँगरेज़ कलकत्ता जरूर सन्देश भेजेगा या बात करेगा ,तुम लोगों ने आफिसों को
कब्जे में ले लिया है पर कई गुप्त जगहों पर सरकारी फोन और टेलीग्राफ लगा है जिनमें
से कई की जानकारी पुलिस में होने के बावजूद मुझे भी नहीं है |हो सकता है वह सन्देश
भेजा जा चुका हो और फ़ोर्स कलकत्ते से रवाना भी हो चुकी हो पर हमें उम्मीद रखनी ही
होगी | एक छोटा सा एक्स्चेंज गाँव के बाहर काली मंदिर के पास है यहाँ की सारी
टेलीग्राफ और टेलीफोन लाएनें इसी के माध्यम से मिदनापुर और फिर कलकत्ता जातीं हैं
,बस हमें उसे उडाना है | पर ये काम जितनी जल्दी हो उतना अच्छा ताकि गरीबों की जमीन
के पट्टे हम जमींदारों से छीन कर उन्हें दे सकें और जेलों में गैरकानूनी ढंग से
ठूंसे गए भाइयों को छुडा सकें “
कांग्रेसियों के दिल में तो योजना के लिए समर्थन था पर बाद में उग्रवादी का लेबल
कौन चिपकवाए इसी उधेड़बुन में सब लगे हुए थे | सरजू के लिए देशभक्ति की अलग अलग
विचारधाराओं में अंतर नहीं था | वह बोला “मुझे कुल्हाड़ी दे दो अभी उसे तोड़ आता हूँ
” लोगों की हंसी छूट गयी ,एक बोला “उसके पास ही पुलिस की रिजर्व लाइन है ,अभी तो
आदमी कम होने से वो शहर में आने से डर रहे हैं पर उनके इलाके में जाना सुसाइड करने
जैसा है | और फिर पिछली बार की मार के बाद तो तुम ठन्डे पड गए थे| ” दूसरे ने
विद्वता बताई “ वहाँ बम लगेगा भैया ,अगर धरे गए तो सीधे काला पानी “ सरजू जोश में
आ चुका था “ अब एक बार बोल दिए तो बोल दिए ,बम लगाना है तो बम ही सही ,जान जाती है
तो जाए अपना धर्म मैं नहीं छोडने वाला “ डी.एस.पी साहब ने समझाया “सरजू को चाय
पिलाओ ,दस मिनट बाद भी अगर यही कहता है तो पांडे हेड साहब से मिला दो ,बम वही
देंगे ” सरजू यंत्रवत सा चाय पीने चला गया | चाय की चुस्कियों के साथ उसे बीवी बच्चों
का चेहरा याद आने लगा| उसके बिना बच्चे भूख से भी मर सकते थे इसमें उसे कोई शंका
नहीं थी ,लाल रंग पसंद करने वाली बीवी को सफ़ेद कपडे में सोचकर तो एक बारगी उसे लगा
की सब छोड़ छाड कर उसके पास भाग जाए | पर अगर अंग्रेज फ़ौज ने आकर गांव को एक और
जलियांवाला बना दिया तो क्या वह लुगाई के पल्लू में घुसा रहेगा इस प्रश्न का उसके
पास कोइ उत्तर नहीं था | अंत में उसने यही सोचा कि सब अपनी किस्मत और कर्म लेकर
आते हैं उसकी किस्मत में अगर काला पानी लिखा है तो यही सही | सरजू अबकी बार संयत
स्वर में बोला “चलो ले चलो भैया पांडे जी के पास ”
.................
आधी रात गुजर
चुकी थी जाने वातावरण में कैसी चिंता व्याप्त थी गली के कुत्ते तक दुबके हुए थे,
गर्मी का मौसम था,वह भी बंगाल की उमसाई गर्मी एक पत्ता भी नहीं खडक रहा था |सरजू
और पांडे हेड साहब एक्सचेंज से कुछ दूर स्कूल की दीवाल से सटे खड़े थे | सरजू को
एक्सचेंज के लगभग ५० गज की दूरी पर जाकर ४ बम फेंकने थे, इतने की तार विभाग को
लाइन जोडने में कई दिन लगें | इतना समय आस पास के गाँव के लोगों के लिए काफी था और
इसके बाद मिलिट्री बुलाए बिना हालत सम्हालना अंग्रेज सरकार के लिए संभव नहीं था |
१२.१५ पर संतरियों की पाली बदलने का समय था , रिजर्व लाइन एक्सचेंज से कुछ १०० गज
दूर थी ,वैसे तो वहाँ २ ही संतरी होते थे पर हालत के मुताबिक़ आज ४ संतरी पहरा दे
रहे थे | सरजू की मुश्किल ये थी कि अगर वो बिना किसी रोक टोक के एक्सचेंज तक पहुँच
भी गया और बम फेंक भी दिया तो भी वापस आने के लिए उसे रिजर्व लाइन के लगभग ५० गज
दूर से गुजरना पड़ता और इस तरह उसका गोली का शिकार बनना या पकड़ा जाना तय था |
सरजू ने देखा कि
संतरी ड्यूटी बदल रहे हैं वह एक्सचेंज की ओर दौड पड़ा और अंदाजन दूरी के हिसाब से
उसने दौड़ते हुए ही चारों बम एक एक करके एक्सचेंज पर फेंक दिए ,गर्मी का मौसम उस पर
सूखी झाडियाँ ,एक्सचेंज धूं-धूं करके जल उठा | रिजर्व लाइन में संतरियों को यही
लगा कि लेन पर कहीं हमला हो गया है उन लोगों ने दीवाल की ओट में पोजीशन ले ली और
सहमे हुए से किसी गतिविधि का इन्तजार करने लगे | सरजू देश पर मर मिटने के लिए तत्पर
था पर वो अपनी जान किसी को थाल में सजा कर देने में यकीन नहीं करता था | उसने
दौडने से पहले ही तय कर लिया था कि वह लौट कर शहर की ओर न दौड कर सीधे जंगल की ओर
दौडेगा | जब उसने लाइन से फाइरिंग की आवाज सुनी तब वह पेड़ों के पहले झुरमुट से
गुजर रहा था ,उसे लगा की सिपाही उसके पीछे हैं | वह लगभग घंटे भर तक दौड़ता रहा
,अंत में जब वह रुका तो वह घने जंगल के बीच था पर वह इतना थक चुका था कि सो गया |
.......................
पांडे सुरक्षित
दूरी से सरजू पर नजर रखा हुआ था जब वह आश्वस्त हो गया कि एक्सचेंज बर्बाद हो चुका
है तो यह खबर उसने कांग्रेस दफ्तर में पहुंची पर सरजू जंगल में क्यों चला गया यह
साफ़ न हो सका | तामलुक का संपर्क बाकी दुनिया से टूट चुका है यह जान कर जनता के
हौसले बुलंद थे | आनन फानन में स्थानीय बुजुर्ग नेताओं के नेतृत्व में सरकार बना
ली गयी | देसी पुलिस वालों और वकीलों की सहायता से फर्जी मुकदमों का पता किया गया
और इनके रिकार्ड जला दिए गए | पंचायत के फैसले के अनुसार उन गांव वालों को जमीनों
पर कब्जा दिलाया गया जिनकी जमीन से उन्हें जबरन बेदखल किया गया था | सर्वसम्मति से
कुछ ऐसे ज़मींदारों के नाम सामने आई जिनके पास ५० एकड़ से ज्यादा की जमीन थी पर वो
छोटे किसानों की जमीनों पर सदा गिद्ध दृष्टि रखते थे | इन महानुभावों की आधी जमीन
भूमिहीनों में बाँट दी गयी | शराब के ठेकों पर तो महिलाओं ने ऐसा कहर बरपा किया कि
कई विद्रोहियों को भी ठेके वालों पर रहम आया गया | अधिकांश अंग्रेज अफसरों को
जेलों में बंद कर दिया गया था पर उन्हें कैदियों को मिलने वाली कानूनी सुविधाएँ
प्राप्त थीं पर ये बात और है कि अंग्रेजी
कानून में इस तरह के सुविधाओं के ज्यादा प्रावधान नहीं थे | अंग्रेजों के शिकायत
करने पर देसी जेलर यही कहता “ साहब का करें अब आप ही के कानून के अनुसार तो चल
रहें हैं,हम गंवार हिंदुस्तानियों को भला कानून बनाने की समझ कहाँ “
इस सारी अफरा
तफरी में यह जानने वाले बहुत कम थे कि आखिर एक्सचेंज कांड वाला आदमी कौन है ,और जो
जानते थे वह ऐसे नायक की पहचान बता कर उसे कालापानी भेजने के इच्छुक नहीं थे |
सरजू घने जंगल में जब आदिवासियों को पड़ा मिला तब उसका शरीर तेज बुखार से ताप रहा
था | शायद वो स्वस्थ होता तो आदिवासी उस पर भरोसा न करते पर बीमार आदमी को मरने के
लिए छोडने पर उनमें सहमति नहीं बन पाई सो सरजू को वो अपने गांव ले गए ,वह उनके
गाँव में रहता हुआ धीरे धीरे ठीक होने लगा | असल में वह इतना डरा हुआ था कि उसे
लगता था कि कभी भी या तो उसे गोली मार दी जाएगी या उसे कालापानी भेज दिया जाएगा |
जब भी वह सोता तो उसे पीछा करते सिपाही नजर आते ,हरदम मौत के डर से उसकी स्थिति
कुछ एसी हुई कि जो बुखार हफ्ते दस दिन का था उसे ठीक होने में तीन महीने लग गए |
चौथे महीने के अंत तक तो सरजू पूरी तरह ठीक था पर उसके मन में भय के बीज अभी भी
उपस्थित थे | खैर ,किसी तरह जी कडा कर वह एक आदिवासी मित्र को साथ लेकर गाँव की ओर
निकल पड़ा | सरजू जब रिजर्व लाइन के पास पहुंचा तो उसने आदिवासी से टोह लेने को कहा
| आदिवासी भाई से भाषा तो नहीं बनती थी जो भी वह जान पाया उससे इतना तो सरजू समझ
गया कि अब शहर का शासन अंगरेजी हाथों में नहीं है | सरजू की खुशी का कोइ ठिकाना
नहीं रहा अपने मित्र को लाखों धन्यवाद देते हुए वो अपने घर की ओर पागलों की तरह
दौड पड़ा | आधा घंटे का रास्ता पन्द्रह मिनट में तय कर जब वह घर पहुंचा तो घर का
दरवाजा खुला हुआ था वहाँ कोई नहीं था | उसे लगा की हो न हो अंग्रेज सरकार ने उसके परिवार के साथ कुछ बुरा किया है ,वह
बदहवास सा बाहर मकानों में किसी परिचित को ढूँढने लगा पर अब उसने ध्यान दिया तो
पता चला कि सारे मकानों पर ताले लटके हुए हैं | वह टोला मेहतरों का था और गांव से
कुछ बाहर था,उसमें २० -२५ से ज्यादा मकान नहीं थे सो सरजू यह समझ नहीं पा रहा था
कि अपने परिवार की किससे खबर ले | किसी अनहोनी की आशंका से वह पागलों सा दौडने लगा
में रोड पर आते आते उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा | वह बीच सड़क में एक बघ्घी
से टकरा कर गिर गया और बघ्घी का पहिया उसके पैर पर से निकल गया |
सरजू की जब आँख
खुली तो वह अस्पताल में था | बस्ती का एक परिचित रिक्शावाला भी वहाँ भरती था सरजू
ने उससे बहुत मिन्नतें की “ सरला को ढूंढ कर उसे मेरा पता बता दो बेचारी बड़ी
परेशान हो रही होगी जाने घर में चूल्हा भी जला होगा या नहीं ” रिक्शेवाले ने उसे
आश्वस्त किया कि वह कोशिश करेगा , इस बात को करीब महीना बीत गया | एक दिन बच्चों
के साथ सरला अस्पताल आई उसका रंग कुछ खिल गया था,बच्चे भी शर्ट और हाफ पेंट पहने हुए थे| वह जल्दी ही
पूछ बैठा कि बच्चे इतने अच्छे कपडे कैसे
पहने हैं तब सरला ने बताया “ महीना भर तो बंसी हमें पैसा देता रहा पर एक दिन उसने
कहा की मोहल्ले वाले उसे ऐसा समझते हैं कि
बेवकूफ बन कर वो दूसरे की बीवी पर पैसे बर्बाद कर रहा है तब मुझे उसके घर बैठना
पड़ा उसकी बीवी भी समझती है और मैं राजीखुशी हूँ |उससे मुझे बच्चा भी होने वाला है
|” अब सरजू ने गौर किया तो समझा कि सरला गर्भवती है | ” तुमने कभी हमारे पेट की
परवाह नहीं की पर मैं यह भी जानती हूँ कि तुम दिल के बुरे नहीं इसीलिए तुमसे आज भी
मिलने चली आई और सोचा कि सब कुछ तुम्हें अपने मुंह से बता दूं | कोइ और बताता तो
जाने तुम क्या सोचते?अब मैं चलूँगी ...और हाँ बंसी कह रहा था कि तुम्हे किसी तरह
की मदद की जरूरत हो तो वह हमेशा तैयार है “
सरजू क्या कहता आँखें भींच लीं और हाथ से सरला
को जाने का इशारा किया वो देश के लिए जान लुटा सकता था पर उसकी इज्जत एसी लुटेगी
नहीं सोचा था |उसके दिमाग में कहीं यह बात गूँज उठी कि अच्छे कम का फल अच्छा ही
होता है| इस ख्याल के बाद वह समझ गया कि अब वो न तो जीने की इच्छा रखता है और न ही मरने की |
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ईश्वर की मर्जी
मानें , तामलुक की जनता का हौसला , अंग्रेजों की भारत पर ढीली होती पकड़ का नतीजा
या और जो भी राय लोग रखतें हों – पर इतिहास गवाह है कि तामलुक की सरकार दो साल से
ज्यादा समय तक चलती रही और तभी भंग हुई जब गांधीजी ने स्वयं ऐसा निर्देश दिया | उस
दिन के बाद से सरजू के दिमाग और स्मृति के पट जैसे बंद हो चुके थे | पुराने
कांग्रेसियों ने उसे दफ्तर में चायपानी जैसे छोटे मोटे कामों के लिए रख लिया था |
पर उससे कोई भी काम लेना बहुत मुश्किल था ,उसकी आँखों में अब कोई भाव नहीं आते थे
और उसे कुछ भी समझाना असंभव सा था | हाँ ,तिरंगे को देख कर उसकी आँखों में फीकी सी
चमक आती थी पर उस चमक को देखने वाला कोई नहीं था | कांग्रेस दफ्तर में ४२ से ४७ का
समय सत्ता की वृद्धि का था जो चंद लोग सरजू को जानते थे वो धीरे धीरे हशिये पर जा
रहे थे| ४७ के बाद के ताकतवर लोगों को न तो किसी सनकी नौकर की आवश्यकता थी न ही
उसके द्वारा किए महान अलिखित कारनामों कोई इज्जत, इस समय हर कोई स्वतंत्रता
संग्राम सेनानी कहलाना चाहता था ऐसे में सबूतों और गवाहों की जरूरत पडती थी और
सरजू तो खैर खुद से भी अनजान था | स्वतंत्रता प्राप्ति के चंद महीनों बाद सरजू को
एक कार्यकर्त्ता ने मंदिर में बैठा दिया ,बोला “ दादा यहाँ बैठे बैठे तुम्हारे
खाने का जुगाड हो जाएगा अब दफ्तर आके परेशान होने की जरूरत नहीं है ”
इसके बाद जाने
क्यों आकाश की आवाज भारी होने लगी ,बोला “मंदिर में सरजू की विजय गाथा का तुम्हारे
शोध से अधिक सम्बन्ध नहीं है बस यह जान लो कि २६ जनवरी १९५० के दिन एक महिला को
उसने अपने पति और बच्चों के साथ देखा था,इसके बाद उसकी आँखें पथरा गईं और उसका
शरीर भी ....... ”
आकाश ने वरुण से
पूछा “तुम्हारे शोध का विषय यह हो सकता है कि क्या सरजू और उसके जैसे लोग महान थे
” वरुण और विशाखा की आँखें भी नाम हो चुकीं थीं पर वरुण स्वर संयत करके बोला “
दादा मैं सरजू के साथ कितनी भी सहानुभूति रखूँ पर महानता की कसौटी पर खरे उतरने के
लिए हमको ये सोचना होगा कि उसने क्या किया और उसके क्या परिणाम हुए | भारत छोडो
आंदोलन गांधीजी ने कई लोगों की सहायता से चालू किया ,मतांगना हजरा के बलिदान से
उठी देशप्रेम की लहर ने तामलुक में सरकार बनाई ,ठीक है सरजू ने लोगों के बोलने पर
एक्सचेंज उड़ा दिया पर यदि वो ऐसा नहीं भी करता तो कुछ बिगड़ता ऐसा मुझे नहीं लगता
|अंग्रेज सरकार तो दो साल तक तामलुक में कानून व्यवस्था बहाल नहीं कर पाई | जनता
के सन्गठित प्रयास और अंग्रेजों की कमजोरी के कारण मैं नहीं मानता कि सरजू को महान
कहा जा सकता है| मैं तो कहता हूँ कि महानता एक विचार है कोई महान काम नहीं करता हम
सब एक बड़ी मशीन के छोटे से कलपुर्जे हैं”
“और तुम विशाखा”
आकाश ने टटोला
विशाखा “सरजू से
खुद कोई कहता कि तुम महान हो तो पहले तो वह इसका मतलब ही नहीं समझता और समझता तो
फिर ऐसे बेतुके विचार पर खूब हंसता पर प्रश्न ये नहीं है कि सरजू खुद को महान
समझता था या नहीं,प्रश्न तो यह है कि इतिहास उसको और उस जैसे लाखों लोगों को क्या
समझता है |पहली बात तो यह है कि इतिहास को निर्धारण करना होगा कि यदि सरजू और उस
जैसों को आंदोलन में से हटा दें तो क्या बचेगा ,कुछ नहीं | सागर के लिए बूँद
आवश्यक है,यदि हर आदमी हिंसक हो कर अंग्रेजों पर टूट पड़ता तो कौन कहता कि भारत का
अनोखा अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन था ,इसीलिए निश्चित ही सरजू महान था चाहे वो और
उसके समकालीन उसके बारे में कुछ भी सोचें |सरजू ने जो किया उसका लाभ आंदोलन को
मिला जो वह ऐसा नहीं करता तो क्या होता ये तार्किक नहीं बल्कि कयास लगाने वाली बात
है |दूसरी बात यह है कि महानता प्राय: क्षमताओं और परिणामों से सम्बंधित तो होती
ही है पर उससे भी अधिक हमारे चुनावों से सम्बन्धित होती है | यदि मनुष्य उड़ सकता
तो कौन तेनजिंग नोरके को महान कहता, यदि हम प्रकाश अपनी इच्छा से पैदा कर सकते तो
थोमस अल्वा एडीसन का आविष्कार साधारण और शायद औचित्यहीन होता | सन्दर्भ के बिना
महानता का आकलन संभव ही नहीं है | सरजू की आर्थिक,पारिवारिक और सामाजिक स्थितियों
के बावजूद उसके द्वारा किए गए चुनाव ही उसे महान बनाते हैं |
वरुण ने हंसते हुए हाथ
जोड़ लिए “देवी आप मेरे सेक्शन में नहीं हैं यह मेरा सौभाग्य है” पर न जाने क्यों विशाखा की आँखों में विजय की
प्रसन्नता नहीं थी |
bahut badhiya.. Is kahani ke madhyam se aapne kai saikdon Sarjuon aur unki shahad bhari ansuni kahaniyon ko ek aprateem shraddhanjali de hai.. Naman hai aise veeron ko..
ReplyDeletethnax ...sahil bhai
ReplyDeleteIt is not just the uniqueness of a subject that makes a story gripping, the way it is narrated is equally important. full marks for your vivid imagination and great storytelling.
ReplyDeletecheers,
-Deepak