Sunday, February 1, 2015

इंतजार
जमीन से सटी पथराई  आँखें,                                                                       
 बोझिल सी होने लगी हैं                                                                          
औंधे पड़े हुए                                                      
जमीन की सीलन                                                
तुम्हारा इन्तजार

इन्तजार..पर बसी हो                                                                                  
इस कमरे की हर चीज़ में                                                                               
टूटा मटका ,पैबन्दों से बनी चादर,                                                     

टूटी बल्लियों की छत,                                                                              जहाँ से चाँद झांकता है ,तुम्हारे शहर का बाशिंदा                                                       
 भुखमरी ,पेट से पीठ सटाकर
यूं तो खुला है दरवाजा फिर भी                                                                        
इन्तजार है खटखटाने की आवाज का                                                                            
और तुम ....बेवफा....
दौलत से खिंची चली जाती हो क्या ?तुम भी                                                                    
या फिर रक्तचाप मधुमेह जैसे मंहगे नामों से                                                                    
पांच सितारा आई.सी.यू के कमरों में

मौत.........                                                                                           धूल की चादर की तरह                                                                                
 यूं तो पसरी हुई हो ,हर शै में इस कमरे की                                                                   
आती नहीं ,रस्मी तौर पर                                                                                    खुला दरवाजा खटखटा कर 

TEEN MULAKATEN - 40 SAAL

दो जोड़ी क़दमों के निशान



५ जुलाई १९९७
कालेज में पहला दिन
लाइबेरी.... वो क्या होती है ?” किसी कान्वेंटेड  लड़की का स्वर था |
 “आइए मैं बता देता हूँ, क्या होती है  मैं रोक नहीं पाया खुद को बोलने से | उसको शायद कुछ चैलेन्ज सा लगा इसीलिए वो रुक गयी |
 मेरे मुंह से शब्द निकले ही जा रहे थे  आपको शायद लगता होगा कि ये सब किताबें कुछ रूढ़िवादी टाइप बातें करती हैं और इनमें आपके काम का कुछ नहीं हो सकता है पर हो सकता है इन्हें न पढ़ कर आप जिदगी के एक ऐसे पहलू से अनजान रह जाएँ जो आप देख पातीं तो दिलचस्प होता
मसलन ”  कान्वेंट गर्ल  की ग्रामर में उर्दू भी है ..हम्म
मसलन एन रेंड , वो रोकती है हमें कनफर्मिस्ट होने से | सोचिए जितना हम सोचते हैं दुनिया के रिएक्शन का उतना  न भी सोचें तो क्या होगा ? लोग बोलते हैं तो बोलें बातें कोई चिपक थोड़ी ही  जाती हैं हमसे......है ना | फिर ग़ालिब को ही क्या उसके जीवन काल में सभी महँ मानते थे   
अच्छा तो आप पढ़ चुके है उसे “
 मुझे डर लगा उससे वो एक इन्टीलेक्चुअल लडकी थी ....अमेरिकन क्लासिक्स पढी हुई | मैं  १७ का ही तो था इस प्रजाति की कन्याओं से सामना नहीं हुआ था बल्कि उनके अस्तित्व से ही अनजान था |
उसने मुझे चुप देख  काउंटर किया
वो तो निज स्वार्थ - जिसे वो ईगोटीस्म कहती है के अलावा कुछ भी नहीं मानती | यदि मैं किसी भूखे को दो रोटी दे दूं तो आपकी लेखिका मेरा  साइको एनालिसिस कर के कहेगी कि मैं अपने आप को महान सिद्ध करने के लिए उसकी मदद कर रही हूँ |है न
उफ्फ कुछ ज्यादा ही ज्ञानी थी वो  |     
हां शायद, आपका भी एंगल दिलचस्प  “ 
पत्तियों से छनती रोशनी कुछ ऐसा लाल रंग घोल रही थी उसके गाल पर जैसे किसी शैतान बच्चे ने आटे में एक चुटकी सिन्दूर मिला दिया हो | मैंने उसे बता दिया उसकी गाल की लाली पर मेरे विचार क्या हैं |
राईटर टाइप हो तुम ,कभी किताब लिखो न मुझपे
जान तो जाऊं पहले
वैसे इक बात है हम  सेफली मिल सकते हैं क्योंकि मैं रायटर टाइप लड़कों पर सेंटी नहीं होती हूँ  | उस तरह यू विल गेट टू नो मी और शायद बुक लिख पाओगे मुझ पर   ”
हल्का सा बुरा लगा पता नहीं क्यूँ फिर दिल को झिडकी दी ..क्या रे यहाँ भी चालू हो गया तू  | फिर भी थोडा आहत तो हुआ था , इतनी अच्छी लाइन बोली उसके लिए फिर भी स्टाइल मार रही है |
जल्द ही मैं मेरी होने वाली धर्म पत्नी श्रेया से मिला | हम इजीनियरिंग  के चार सालों तक लगातार डेट करते रहे |
बहरहाल
वो ....जिसकी बात चल रही थी
मुझसे कुल साढ़े पांच बार मिली शुरुआती १ साल में
कभी उससे मिलने का प्लान नहीं किया | हम कभी कैंटीन में ,कभी काफी शाप में और यहाँ तक कि जग्गू के ढाबे में भी मिले |  लेकिन एक बात थी हमारी मन की तरगो की  फ्रीक्वेंसी परफेक्ट मेच होती थी | रेडियो के ज़माने में कभी तो काफी जद्दोजहद के बाद भी स्टेशन नहीं लग पता था और कभी एन्वेई न जाने उन तरंगों पर कौन जादू करता था कि फ्रीक्वेंसी मेच होकर ऐसी स्पष्ट आवाज आती जैसे लता दीदी सामने बैठ कर गा रही हों | अक्सर लोगों से जो हम कहना चाहते हैं उसका बहुत सा हिस्सा अनकहा रह जाता है पर हम दोनों न जाने कैसे धुंध की तरह फैले उस अनकहे हिस्से को समझ लेते थे | फिर प्रोब्लम क्या थी ? हमारा बचकाना  बचपना.......क्या कहा जाए  | देवदास पारो की गौरवशाली परंपरा को कायम रखते हुए हम अपने ईगो को नाज़ों से पाल कर रखते थे | मिलते तो बस इत्तेफ़ाकन | मजाल है कि कभी अगली बार मिलने का प्लान किया हो | एक बात लाख नकारने के बाद भी कई बार हमारे बीच अमरबेल की तरह उग के खडी  हो जाती थी | कैसे सिद्ध किया जाए की हम एक दुसरे के लिए परफेक्ट नहीं हैं  और तब हम शुतुरमुर्ग की तरह अपने रिश्ते के अस्तित्व को ही नकार दिया करते |
निर्णय के पल को सुदूर भविष्य में फेंक कर हम इसी बात के अलग अलग वर्जन्स दुहराते  बुढ़ापे में हम जरूर मिला करेंगे , रोज ,सारी जरूरी मगजमारी से मुक्त हो कर ,फुर्सत से गप्प किया करेंगे
सेकण्ड इयर में वो पढ़ने  एम. आई .टी  चली गयी, अमेरिका  |


५ मार्च २०१७
फेसबुक को धन्यवाद कि हम मिल पाए | एम्स्टर्डम में स्टोपेज लेती मेरी फ्लाईट ने हमें २ घंटे का समय दिया था | वो पतिदेव को इत्तेला कर के आई |
अच्छा तुमको भी दोस्तोवस्की पसन्द है वो चौंक के बोली कहाँ अमरीकन एन रेंड और कहाँ रशियन दोस्तोवस्की | ड्यूड तुम तो बदल गए रेंड बेचारी को तन्हा छोड़ दिया तुमने
साइको एनेलिसिस पसंद है मुझे कोई भी किरदार जो है वो क्यों है यह जानना हमेशा दिलचस्प होता है ..नईं |
तो चेतन भगत को नहीं पढ़ते होगे तुम
पढता हूँ न , समझने के लिए कि वो इतना हिट क्यों है मैंने कहा
क्या यार मुझपे लिखते तो पहले ही हिट हो चुके होते
कुछ अनकहा सा याद आ गया मुझे  खुश तो हो तुम
शैतान ! क्या सुनना चाहते हो तुम ,तुम्हारे नावेल की हीरोइन से | अच्छा बताओ न अगर मैं बोलूँ कि वो मीटिंग छोड़ दो ..यहीं रुक जाओ ...यहाँ से हम वेनिस चलते हैं ..कम से कम एक महीने तक सिर्फ यूरोप की सडको पर बिना प्लान घूमेंगे ...बिलकुल गोआ के बेकपेकर्स की तरह तो क्या करोगे तुम
उसकी आँखों में एक आशावादी मुस्कान तैर रही थी बिलकुल बच्चों जैसी | मैं बस एक ही चीज चाहता था उस पल बस एक किस | स्वादहीन और गंधहीन किस | पानी की तरह स्वच्छ और प्यास बुझाने वाली | मेरे पास शब्द नहीं थे बस किस ही थी | उसने मुझे २ सेकण्ड भी नहीं दिए जवाब देने को , बोल पडी  “अरे डम्बो ! आइडिया दे रही हूँ नावेल के लिए | ” कुछ सोच के फिर बोली खुश हूँ मैं सर ! जितना कि इन्सान के लिए संभव है और तुम
उसने मुझे बात का सिरा पहले ही पकड़ा दिया था  हां मैं भी उतना खुश हूँ जितना किसी सामान्य इन्सान के लिए संभव है
कुछ मौलिकता दिखाओ मेरे होने वाले राईटर | क्या कापी पेस्ट करते रहते हो
मौलिकता ,ओके ,लेट मी किस यू
उसकी आँखों में आश्चर्य कौंधा फिर कुछ रहस्यमय सा जो सिर्फ लड़कियों की ही आँखों में देखा जा सकता है फिर बेचारगी भी | बैग उठा के चल दी वो |
मेरे मुंह से अस्फुट सा सॉरी ही निकल सका पर उसने सुन लिया 
 “चल पागल है क्या , मिलते हैं फिर कभी बोलते हुए उसकी आवाज में बेइम्तेहा नरमी उतर आई थी ,
फिर बोली “ मिलेंगे यार हम बुढ़ापे मैं जब तेरी वाईफ और मेरा हसबेंड हमें लेकर असुरक्षित नहीं होंगे
५ दिसंबर २०३७
गोवा....अगोंडा बीच ( अक्षांश देशांस लिखने का मन कर रहा है फ़िल्मी स्टाइल में पर रहने दीजिए )
सामने अरब सागर लाल रंग दिखा कर गुड नाईट कहने ही वाला है और वो मेरे बाजू की रिलेक्सिंग चेयर में पसरी हुई है | थकी है कुछ अभी अभी जो आई है | शुरुआत तो मुझे ही करनी है हमेशा की तरह  
यार बुढ़ापे में हमें चार धाम वगैरा जाना चाहिए और हम गोआ में पड़े हैं  “
हाँ सही तो है मुझे किस करने के लिए तुम ३५ साल से इन्तजार कर रहे हो | अब काफी पुन्य इकठ्ठा कर चुकी हूँ अब थोडा पाप भी हो जाए