इंतजार
जमीन से सटी पथराई आँखें,
बोझिल सी होने लगी हैं
बोझिल सी होने लगी हैं
औंधे पड़े हुए
जमीन
की सीलन
तुम्हारा
इन्तजार
इन्तजार..पर बसी हो
इस कमरे की हर चीज़ में
इस कमरे की हर चीज़ में
टूटा
मटका ,पैबन्दों से बनी चादर,
टूटी
बल्लियों की छत, जहाँ से चाँद झांकता है ,तुम्हारे शहर का बाशिंदा
भुखमरी
,पेट से पीठ सटाकर
यूं तो खुला है दरवाजा फिर
भी
इन्तजार
है खटखटाने की आवाज का
और
तुम ....बेवफा....
दौलत से खिंची चली जाती हो
क्या ?तुम भी
या
फिर रक्तचाप मधुमेह जैसे मंहगे नामों से
पांच
सितारा आई.सी.यू के कमरों में
मौत......... धूल
की चादर की तरह
यूं
तो पसरी हुई हो ,हर शै में इस कमरे की
आती नहीं
,रस्मी तौर पर
खुला दरवाजा खटखटा कर
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